डॉ. अनिल सिंघवी, MD · 35+ साल का अनुभव · मध्य प्रदेश के पहले हेमेटोलॉजी सेंटर के संस्थापकइंदौर में क्लिनिक आकर या वीडियो कॉल पर सलाह लें।
मल्टीपल मायलोमा प्लाज़्मा सेल का कैंसर है। ये बोन मैरो की वे कोशिकाएँ हैं जो एंटीबॉडी बनाती हैं। असामान्य कोशिकाएँ बोन मैरो में भर जाती हैं और एक असामान्य प्रोटीन बनाती हैं, जिससे खून की कमी, हड्डियों को नुकसान, कैल्शियम बढ़ना और किडनी की परेशानी होती है।
मायलोमा के इलाज में लगभग किसी भी दूसरे कैंसर से ज़्यादा सुधार हुआ है। नई दवाइयों के मेल से बीमारी अच्छे से काबू में आती है, हड्डियाँ और किडनी सुरक्षित रहती हैं, और भारत में ये दवाइयाँ लगातार सस्ती हो रही हैं। ज़्यादातर मरीज़ों पर इलाज अच्छा असर करता है और वे अपने रोज़ के काम पर लौट आते हैं।
बीमारी का पता असामान्य (M) प्रोटीन के लिए खून और पेशाब की जाँच, बोन मैरो जाँच और हड्डियों के स्कैन से चलता है। इन्हीं जाँचों से बीमारी की स्टेज और ख़तरे का अंदाज़ा मिलता है, जिससे तय होता है कि इलाज कितना तेज़ होना चाहिए।
इलाज में नई दवाइयों का मेल दिया जाता है: प्रोटियासोम इनहिबिटर (जैसे बोर्टेज़ोमिब), इम्यूनोमॉड्यूलेटरी दवाइयाँ (जैसे लेनालिडोमाइड) और स्टेरॉयड। इनमें से ज़्यादातर डे-केयर में या घर पर गोलियों के रूप में दी जाती हैं। कम उम्र के उपयुक्त मरीज़ों को असर और गहरा करने के लिए स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह दी जा सकती है। हड्डियों को बचाने वाली दवाइयाँ और साथ की देखभाल हर इलाज का हिस्सा हैं।
यह जानकारी सिर्फ़ आम जानकारी के लिए है, यह डॉक्टर से सलाह की जगह नहीं ले सकती। हर मरीज़ अलग होता है, और सही इलाज पूरी जाँच के बाद ही तय किया जा सकता है।
मल्टीपल मायलोमा का इलाज कैसे आसान और ज़्यादा असरदार हुआ है।
मल्टीपल मायलोमा पर जीत: हर मरीज़ को क्या पता होना चाहिए।
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